आपाणो राजस्थान
AAPANO RAJASTHAN
AAPANO RAJASTHAN
धरती धोरा री धरती मगरा री धरती चंबल री धरती मीरा री धरती वीरा री
AAPANO RAJASTHAN

आपाणो राजस्थान री वेबसाइट रो Logo

राजस्थान रा जिला रो नक्शो
(आभार राजस्थान पत्रिका)

News Home Gallery FAQ Feedback Contact Help
आपाणो राजस्थान
राजस्थानी भाषा
मोडिया लिपि
पांडुलिपिया
राजस्थानी व्याकरण
साहित्यिक-सांस्कृतिक कोश
भाषा संबंधी कवितावां
इंटरनेट पर राजस्थानी
राजस्थानी ऐस.ऐम.ऐस
विद्वाना रा विचार
राजस्थानी भाषा कार्यक्रम
साहित्यकार
प्रवासी साहित्यकार
किताबा री सूची
संस्थाया अर संघ
बाबा रामदेवजी
गोगाजी चौहान
वीर तेजाजी
रावल मल्लिनाथजी
मेहाजी मांगलिया
हड़बूजी सांखला
पाबूजी
देवजी
सिद्धपुरुष खेमा बाबा
आलमजी
केसरिया कंवर
बभूतौ सिद्ध
संत पीपाजी
जोगिराज जालंधरनाथ
भगत धन्नौ
संत कूबाजी
जीण माता
रूपांदे
करनी माता
आई माता
माजीसा राणी भटियाणी
मीराबाई
महाराणा प्रताप
पन्नाधाय
ठा.केसरीसिंह बारहठ
बप्पा रावल
बादल व गोरा
बिहारीमल
चन्द्र सखी
दादू
दुर्गादास
हाडी राणी
जयमल अर पत्ता
जोरावर सिंह बारहठ
महाराणा कुम्भा
कमलावती
कविवर व्रिंद
महाराणा लाखा
रानी लीलावती
मालदेव राठौड
पद्मिनी रानी
पृथ्वीसिंह
पृथ्वीराज कवि
प्रताप सिंह बारहठ
राणा रतनसिंह
राणा सांगा
अमरसिंह राठौड
रामसिंह राठौड
अजयपाल जी
राव प्रतापसिंह जी
सूरजमल जी
राव बीकाजी
चित्रांगद मौर्यजी
डूंगरसिंह जी
गंगासिंह जी
जनमेजय जी
राव जोधाजी
सवाई जयसिंहजी
भाटी जैसलजी
खिज्र खां जी
किशनसिंह जी राठौड
महारावल प्रतापसिंहजी
रतनसिंहजी
सूरतसिंहजी
सरदार सिंह जी
सुजानसिंहजी
उम्मेदसिंह जी
उदयसिंह जी
मेजर शैतानसिंह
सागरमल गोपा
अर्जुनलाल सेठी
रामचन्द्र नन्दवाना
जलवायु
जिला
ग़ाँव
तालुका
ढ़ाणियाँ
जनसंख्या
वीर योद्धा
महापुरुष
किला
ऐतिहासिक युद्ध
स्वतन्त्रता संग्राम
वीरा री वाता
धार्मिक स्थान
धर्म - सम्प्रदाय
मेले
सांस्कृतिक संस्थान
रामायण
राजस्थानी व्रत-कथायां
राजस्थानी भजन
भाषा
व्याकरण
लोकग़ीत
लोकनाटय
चित्रकला
मूर्तिकला
स्थापत्यकला
कहावता
दूहा
कविता
वेशभूषा
जातियाँ
तीज- तेवार
शादी-ब्याह
काचँ करियावर
ब्याव रा कार्ड्स
व्यापार-व्यापारी
प्राकृतिक संसाधन
उद्यम- उद्यमी
राजस्थानी वातां
कहाणियां
राजस्थानी गजला
टुणकला
हंसीकावां
हास्य कवितावां
पहेलियां
गळगचिया
टाबरां री पोथी
टाबरा री कहाणियां
टाबरां रा गीत
टाबरां री कवितावां
वेबसाइट वास्ते मिली चिट्ठियां री सूची
राजस्थानी भाषा रे ब्लोग
राजस्थानी भाषा री दूजी वेबसाईटा

राजेन्द्रसिंह बारहठ
देव कोठारी
सत्यनारायण सोनी
पद्मचंदजी मेहता
भवनलालजी
रवि पुरोहितजी
अखिल भारतीय राजस्थानी भाषा मान्यता संघर्ष समिति राजस्थान री चिट्ठिया

 

डा.राजेन्द्रबारहठ
प्रदेश महामंत्री
पतौ c/o हर्ष सुहालका
60, गारियावास, उदैपुर
जैबी कानाबाती :-
9829566084

प्रो.कल्याणसिंहशेखावत
प्रदेश संयोजक
15, सुभाषचन्द्र बोस कालोनी
से.2, डिफेन्स लेव रोड
रातानाडा, जोधपुर,
9314710732

हरिमोहनसारस्वत
प्रदेश पाटवी
पतौ सूरतगढ डिग्री कालेज
सूरतगढ जिलौ-श्री गंगानगर, राज
जैबी कानाबाती :
9414090492


ऑक
राजस्थानी------------------------------------------------राजस्थानी राखिया रेसी राजस्थान
आदरजोग,
निदेशक
एस.आई.ई.आर.टी.
उदयपुर राजस्थान

विषय: हमारा राजस्थान पुस्तक को आपाणौ राजस्थान करने हेतु।

मानजोग,

देश में अनिवार्य शिक्षा कानून पास हुआ है। देश के अन्य प्रान्तो की तरह राजस्थान में भी यह लागू हो रहा है। यह अत्यन्त प्रसन्नता की बात है कि इससे राजस्थान बीमारू राज्यों की गिनती से बाहर निकल सकेगा। क्योकि अनिवार्य शिक्षा कानून में यह प्रावधान है कि प्राधमिक शिक्षा मातृभाषा में होगी देश दुनिया में यह सुत्र लागू है। देश दुनिया कि हर शिक्षा समिति ने मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा कि सिफारिश की है। संविधान में त्रिभाषा सूत्र कि भी यही भावना है। राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के अन्तर्गत राजस्थान में प्रौढशिक्षा में 32 जिलो की 32 प्राइमर मातृभाषा राजस्थानी में तैयार करके एक प्रयोग हुआ है जिसका सुफल आया है, जो सर्वज्ञात है। राजस्थानी एच्छिक विषय के रूप में माध्यमिक शिक्षा बोर्ड में एवं प्रदेश व देश दुनिया के विश्वविधालयों में तीन दशक से चल रही है। प्राथमिक शिषःआ से राज्य में राजस्थानी की शुरूआत नहीं होने से प्रदेश के बच्चे अपनी सांस्कृतिक जडो से कट रहे है।

अत: 63 वर्ष पूर्व हुई प्रदेश की चूक को सुधारने का एतिहासिक अवसर आपके समक्ष खडा है। आप इस पवित्र काम को करन हेतु "हमारा राजस्थान पुस्तक का "आपाणौ राजस्थान नाम करे एवं इस पुस्तक का माध्यम राजस्थानी भाषा रखे। इस हेतु राजस्थानी भाषा, साहित्य, कला, संस्कृति, इतिहास, भूगोल को अधिकारिक विद्वानों को पैनल में जोडकर लिखावे।

आपसे विअनम्र अनुरोध है। प्रदेश के शैक्षिक वातावरण में मायडभाषा के माध्यम से संस्कृति की सुगंध होलने का पवित्र कार्य कर अपनी एतिहासिक जिम्मेदारी निभाए।

सधन्यवाद।
अरजवन्त
डा. राजेन्द्र बारहठ
प्रदेश महामंत्री

प्रतिलिपि
मुख्यमंत्री, राजस्थान सरकार, जयपुर।
शिक्षामंत्री, राजस्थान सरकार, जयपुर।
शिक्षा राज्यमंत्री, राजस्थान सरकार, जयपुर।
प्रमुख शासन सचिव, शिक्षा विभाग।
प्रमुख शासन सचिव कला संस्कृति विभाग, राजस्थान।
निदेश्क, प्रारंभिक शिक्षा निदेशालय, बीकानेर।
अध्यक्ष, राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर।

विषय: हमारा राजस्थान पुस्तक को आपाणौ राजस्थान करने हेतु।

उदयपुर 10 मई 2010 - अखिल भारतीय राजस्थानी भाषा मान्यता संघर्ष समिति राजस्थान के प्रतिदनिधि मंडल ने एस.आई.आर.टी. निदेश्क लक्ष्मी निनामा को ज्ञापन सौपकर कक्षा 1से8 तक के पाठयक्रम में राजस्थानी भाषा शुरू करने हेतु मांग की।

ज्ञापन में कहा कि अनिवार्य शिक्षा कानून में प्रावधान है कि प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में हो। राजस्थान में प्राथमिक शिक्षा 63 वर्षो से मातृभाषा में नहीं दि जा रही है। इससे हमारी नई पीढी की सांस्कृतिक जडे कमजोर होती जा रही है। प्रदेश को बिमांरू राज्यों की गिनती सु बाहर निकालकर शिक्षा-साक्षरता दर बढ़ाने हेतु मातृभाषा शिक्षण ही एक मात्र विकल्प है। ज्ञापन मे कहा गया कि आजादी बाद मातृभाषा शिक्षा में हि अपनाकर जो चूक हुई उसे सुधारने का एतिहासिक अवसर है जिसे एतिहासिक जिम्मेदारी मानकर किया जाना चाहिए। इस हेतु मांग कि गई कि एस आई ई आर टी "हमारा राजस्थान" नाम से पुस्तक शुरू कर रही है उसका नाम आपाणौ राजस्थान रखा जाय। पुस्तक का माध्यम राजस्थानी रखा जाय। इसके लेखन हेतु राजस्थानी भाषा साहित्य कला, संस्कृति, इतिहास, भूगोल के अधिकारिक विद्वानो को जोडा जाय। प्रतिनिधि मंडल में डा.राजेन्द्र बारहठ, कमलेन्द्र सिंह पंवार, डा. विष्णु माली, शक्ति सिंह कारोई, शिवदान सिंह जोलावास, घनश्याम सिंह भीण्डर इत्यादि थे।

मई 2010 अखिल भारतीय राजस्थानी भाषा मान्यता संघर्ष समिति राजस्थान का एक दल ब्रिटेन में मायड भाषा की गूंज करके एवं प्रवासी राजस्थानियों एवं विदेशी बौद्धिक वर्ग के समक्ष राजस्थानी भाषआ सआहित्य संसकति की विलक्षणताओ का प्रदर्शन एवं मायड भाषा मान्यता आन्दोलन का संदेश प्रसारित कर स्वदेश लौटा। राजस्थान विधापीठ में राजस्थानी विभाग समिति के प्रदेश महामंत्री डा. राजेन्द्र बारहठ ने बताया कि इस यात्रा का मूल उद्देश्य राजस्थानी भाषा के सम्मान, संरक्षण की अपील को विश्व मंच पर रखकर विश्व विरासत के रूप में प्रसारित कर प्रवासी एवं बौद्धिक  वर्ग को इस ओर आकर्षित कर मायड भाषा संस्कृति इतिहास के सम्मान संरक्षण के सांस्कतिक महायज्ञ में योगदान की आहूतिया देना पडा। भारतीय इतिहास में राजस्थानी की शास्त्रीय कविता की एतिहासिक भूमिका को रेखांकित कर एवं उसकी शास्त्रीयता, सजन परम्परआ, तत्कालीन सामाजिक वातावरण को बताकर एवं छंदपाठ द्वारा उसका प्रस्तुतिकरण किया। 29 अप्रेल को नेशनल पोट्रेट गोलेरी, एशियन म्युजिक सर्किट, पोयट इन सिटी द्वारा आयोजित कार्यक्रम में राजस्थानी शास्त्रीय कविता सजन परम्परा को जीवंत किया। इस कविता कि लोकगायन परम्परा के सजीव दर्शन कल्ले खा मांगणियार ने करवाया एवं नितिन हर्ष ने उसका फिलमान्कन प्रस्तुत कर सुबोध बनाया। इस कार्यक्रम की रिकोर्डिंग ब्रिटिश लाइब्रेरी ने करके अपने संग्रह में विश्व विरासत के रूप में रखा है जो राजस्थान के लिए गौरव कि बात है। ज्ञात रहे की पूर्व में लाइब्रेरी आफ कांग्रेस अमेरिका ने पदम श्री कन्हैयालाल जी सेठिया की रिकार्डिंग करके अपने संग्रह में रखी है। डा. राजेन्द्र बारहठ ने केम्ब्रिज वि.वि. के साहित्य भाषा विज्ञान, एवं संगीत विभाग के शिक्षा विदों शोधार्थियों एवं विधार्थियों के शोध विषयों में राजस्थानी भाषा साहित्य को लेकर लंबी चर्चा की एवं केम्ब्रिज वि.वि. राजस्त्थानी अध्ययन, अध्यापन शोध को नई दिशा दी।

इस कार्यक्रम में 30 अप्रेल को इण्डियन कम्युनिटी हाल में राजस्थान, गुज रात के प्रवासियों को संबोधित करते हुए डा. बारहठ ने बताया कि राजस्थानी की शास्त्रीय कविता राजस्थान, गुअजरात, मालवा सिंधु की साझा विरासत है।

डा. बारहठ ने 30अप्रेल को लंदन के हैबर पार्क में राजस्थान प्रवासियों की बैैठक में राजस्थानी मान्यता के सवाल की प्रासंगिकता एवं उसमें प्रवासियो की भूमिका पर विसतत व्याख्यान देकर अपील की कि पेट व परिवार की जिम्मेदारी निभाने के बाद हर राजस्थानी जो कुछ भी काम करता है उसे मायड भाषआ संसकति हेतु अपनी उर्जा लगानी चाहिए। उस कार्य एवं स्थान का चयन अपने विवेक से करे। इस कार्य में सक्रिय लोगों, संगठनों से सक्रिय जुडाव से स्वत: अपनी भूमिका व्यक्ति तय कर सकता है। उपस्थित लोगो ने मनशा वाचा कर्मणा से इस पवित्र कार्य में जुटने का संकल्प लिया।

डा. बारहठ ने राजस्थानी समाज, दी राजस्थान फाउण्डेशन, राजस्थानी मोटयार परिषद के सदस्यों से इस संबंध में इस दौरे के दौरान चर्चा कर राजस्थानी मिशन की मजबूती हेतू शिक्षा, मिडिया, फिल्मों को राजस्थानी भाषा में करने में सहयोग की अपील की। कार्यक्रम का संचालन मोटयार परिषद के हन्वन्त सिंह ने किया।

लंदन के एशियन म्युजिक सर्किट आडिटोरियम में 1 मई को बौद्धिक वर्ग एवं शिक्षाविदों के समक्ष राजस्थानी छंद शास्त्र कि सर्वसमृद्धता को प्रतिष्ठापित करते हुए डा. बारहठ ने बताया कि राजस्थानी के गीत छंद के 120 भेद महाभारत रुपक ग्रन्थ में वर्णित है जो विशव मेंविलक्षण है। उन्होंने  इसे शोध विषय के रूप में प्रस्तुत किया एवं छंद पाठ किया। जहां कमायचा पर छंदो पर लोकगायन परम्परा का प्रस्तुतिकरण कल्ले सां मांगणियार ने किया एवं फिल्मांकन प्रस्तुति नितिन हर्ष ने किया। इस कार्यक्रम में अतिथि रूप में ब्रिटेन के उच्च-सदन के संसद सदस्य उषा प्रशान्त थे। कार्यक्रम संचालन वीरम जेसानी ने किया।
कौनसी राजस्थानी?

हम भारत के लोगों ने 26 जनवरी 1950 को अपना जो संविधान स्वीकार किया उसके अनुसार हमने हिन्दी को अपनी राष्ट्रभाषा स्वीकार किया। उस राष्ट्रभाषा में देश के किसी भी राज्य से चुने गए विधायको को शपथ लेने पर उनकी जो दुर्गति की गई उससे उन्हें हमारा संविधान नहीं बचा सका तो उस संविधान के प्रति लोगों कि आस्था स्वत: ही कम होती जायेगी। दक्षिण भारत के राज्यों ने राष्ट्रभाषा हिन्दी का जिस प्रकार से विरोध किया उस प्रकार से हिन्दी का विरोध राजस्थानियों ने नहीं किया। हम राजस्थानवासी हिन्दी के राष्ट्रभाषा होने का विरोध नहीं करते है। हम तो हमारी मायडभाषा राजस्थानी को भारतीय संविधान की आठवी अनुसूची में सम्मिलित कर इसकी संवैधानिक मान्यता चाहते है?

क्षेत्रफल के हिसाब से देश का सबसे बडा राज्य होते हुए भी राजस्थान निवासियों की मायड  भाषा को संवैधानिक मान्यता नहीं है। मै ं इसे अपना दुर्भाज्य ही मानता हूं कि अपनी मायड भाषा की मान्यता के लिए मुझे हिन्दी में लिखना पड अरहा है। भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में कई भाषःआए सम्मिलित है और समय-समय पर उसमे और कई भाषाए जोडी जाती रही, पर राजस्थानी को अभी तक यह सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ है क्योंकि राज्य देश का सबसे बडा अराज्य है। इससे आधे क्षेत्रफल वाले राज्यो की भाषा को वैधानिक मान्यता मिली हुई हैै, पर इसकी भाषा को नहीं, इसे किसकी कृपा समझा जावे। पाकिस्तान के एक राज्य सिंध (जिसका एक वर्ग किलोमीटर भाग भी भारत में नहीं है) कि भाषा सिंधी को हमारे देश के संविधान में मान्यता है, हमारे पडोसी देश नेपाल कि भाषा को भी हमारे देश के संविधान में मान्यता है, पर भारत के सबसे बडे राज्य राजस्थान की मायड भाषा राजस्थानी को भारत में मान्यता नहीं है तो दूसरे देश इसे मान्यता कब देंगे। यह दस करोड राजस्थान वासियों के साथ अन्याय नहीं है तो इसे न्याय भी नहीं कहा जा सकता।

जिसस समय लगभग पूरे भारत पर मुगलों का शासन हो गया था और अकबर (जिसे महान कहा जाता है) ने पारसी को राजकार्य की भाषा घोषित किया उस समय भी राजस्थान कि अपनी भाषा थी भले ही उसका नाम राजस्थानी नहीं रहा था क्योंकि उस समय तो राजस्थान बना ही नहीं था। राजस्थान बनने से पहले इस प्रदेश का नाम राजपूताना था जिस्समे अनेक छोटे बडे राजा राज्य करते थे। जो लोग कहते है कि कोनसी राजस्थानी, उनसे मेरा विनम्र आग्रह है कि वे लोग उस समय रचे साहित्य, पट्टे, परवाने, ताम्रपत्र, राज्यादेश के अध्ययन का थोडा सा श्रम करें और एक बार राजस्थानी अभिलेखागार बीकानेर में पधार कर स्वयं देख ले कि राजस्थानी कौनसी है?

मुझे इस बात का गर्व है कि राजस्थानी के विद्वान डा. मोतीलाल मनेरिया और प्रो. नरोत्तमदास स्वामी मेरे क्रमश: अंग्रेजी और हिन्दी के गुरू रहे है। उस समय यदि राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता मिली हुई होती रो मैं उनसे राजस्थानी अवश्य पढता।

राजस्थानी हिन्दी से निसंदेश प्राचीन है। हिन्दी का तो जन्म ही राजस्थानी से हुआ है। हिन्दी आहित्य के इतिहासकार हिन्दी का आरंभ चन्द अवरदाई ग्रंथ पृथ्वीराज रासो से मानते है जो कि राजस्थानी का ही ग्रंथ है।

राजस्थानी का एक वर्ण (अक्षर) ळ है जो कि हिन्दी अथवा दूसरी किसी भाषा में नहीं है। इसी वर्ण के कारण इस भाषा का नाम डींगल पडा था। इस वर्ण के कुछ उदाहरण देखिये- 1 खाल - चमडी, खाळ-नाला 2 काल-कल, काळ-अकाल मृत्यु, 3 गुल-दिये या चिमनी की बत्ती पर जलने पर इक्कठा होने वाला काला पदार्थ, गुळ-गुड, 4 खल-दुष्ट, खळ-तेल निकालने के बाद बचा हुआ पदार्थ।

राजस्थानी का शब्द भण्डार भी किसी भी प्रकार से हिन्दी से कम हनीं है। इसके लिए सीताराम लालस द्वार तैयार किया गया राजस्थानी शब्द कोष प्रमाण है। कुछ शब्द उदाहरणार्थ दिये जा रहे है जिनकी समता के शब्द हिन्दी में पढने में नहीं आए है: धोबा, लडालूम, गुडिन्दा, कुदकडा, दाबादूबो जीबोटी ओझांको, अकलक, माइत।

अकबर के नवरत्नो में से एक पृथ्वीराज राठोड ने जिस भाषा में अपने ग्रन्थों कि रचना कि है वह ही राजस्थानी है। उनके द्वारा विरचित 'वेळि कृष्ण रूकमणि री' का एक पद देखिये: "बलिबंध समरथ्थि ले बैसारी श्यामा कर साहे सुकरि। वाहर रे वाहर कोई छे वर, हरि हरिणाखी जाई हरि"। क्या फिर भी पूछेंगे कि कौन सी राजस्थानी?

यदि राजस्थानी को आठवीं अनुसूची में सम्मिलित कर लिया जाता है तो भारतीय प्रशासनिक सेवा एवं राजस्थानी प्रशासनिक सेवा में इस भाषा में भी पेपर होगा जिसमें राजस्थान के युवा अपनी मातृभाषा होने के कारण अधिक संख्या में पास होंगे और उन्हें अपने देश एवं राज्य की सेवा करने का अधिक अवसर मिलेगा। जिससे इस राज्य के युवकों  की बेरोजगारी कुछ कम हो सकेगी। जिसका लाभ अभी दूसरे राज्यों के युवक उठा रहे है। राजस्थान की विधानसभा ने राजस्थानी को आठवीं अनुसूची में सम्मिलित करने का सर्व सम्मति से प्रस्ताव पास कर केन्द्र सरकार को भेज दिया है, उसकी अनदेखी करना क्या लोकतंत्र या जनतंत्र का गला घोटना नही है? क्या केन्द्र सरकार तभी जगेगी जब रेल की पटरिया उखाडी जाये, रास्ते रोके जाए आम नागरिकों को कठिनाई में डाला जायें, अराजकता फैलाई जावे, गोलीकांड करवाए जावे एवं लोगों का जीना हराम किया जावे, एक शान्त राज्य में आग लगाई जावे और नक्सलवाद को बढ़ावा दिया जावे। सरकार बच्चों को अनिवार्य एवं नि:शुल्क शिक्षा देना चाहती है। संविधान में त्रिभाषा सुत्र की बात कही गई। जब बच्चे को अपनी मातभाषा में शिक्षा पाने का अधिकार ही नहीं है तो न सरकार की निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षआ की योजना सफल होगी और न त्रिभाषःआ सूत्र सफल होगा और राजस्थान वासी अनपढ ही बने रहेंगे, जिससे हिन्दी का भी कोई लाभ नहीं होगा उल्टी हानि ही होगी।

सर्वप्रथम हिन्दी साहित्य का इतिहास लिख्जने वाले अंग्रेज विद्वान जार्ज अब्राहिम ग्रियर्सन ने अपने वृहद ग्रन्थ "ए लिग्विस्टिक सर्वे आफ इंडिया" में राजस्थानी को एक स्वतंत्र भाषा माना है और इसे हिन्दी से भी प्राचीन माना है। राजस्थानी का इतिहास 2500 वर्ष पुराना है। इसका विरोध करने वाले क्या यह बताने कि कपा करेंगे कि हिन्दी का आरंभ कब से है? हिन्दी की देवनागरी लिपी राजस्थानी की मुडिया लिपि से ही बनी हैै। मुझें इतनी बाते हिन्दी में इस लिए लिखनी पडी कि यदि मै इन्हे राजस्थानी में लिखता तो इसका विरोध करने वाले मेरे विनम्र निवेदन को न रो पढ पाते और न समझ ही पाते। अत: मेरी विवशता को समझ आप लोग मुझे क्षमा करेंगे।

बच्चा जब अपनी मां के गर्भ से बाहर इस संसार में आता है तो वह अपनी मां दूध पीते हुए कुछ बडा होने पर सर्वप्रथम मां कि धवनी निकालता है उसके बाद मामा की और फिर नाना की। बच्चे का जन्म प्रायं अपनी मां के पीहर में ही होता है। उसका सीधा संपर्क अपनी मां के बाद मां के भाई से ही होता है। मां के प्यार के बाद उसे मामा से ही सर्वाधिक प्यार प्राप्त होता है उसके बाद नाना व नानी का नम्बर आता हैै। बच्चा अपनी मां से जो भाषा सीखना आरंभ करता है वही उसकी मातृभाषा है उसे किसी भी तरह पितृभाषआ नहीं कहा जा सकता है और न ही कोई दूसरा नाम ही दिया जा सकता है।

अभी जो प्रदेश राजस्थआन कहा जाता है पूर्व में इसका यह नाम न होकर अलग-अलग काल में पृथक-पृथक नाम रहे थे पर उस समय इस क्षेत्र की भाषा का जो भी नाम रहा हो अब उसे राजस्थानी ही कहा जायेगा। यह इस प्रदेश के दस करोड निवासियों की मात्रभाषा है। जिस प्रकार हिन्दी जिसे खडी बोली भी कहा जाता है कि मैथिली, ब्रज भाषा, अवधी, बघेली, बुंदेलखंडी, हरियाणवी, कुमाउनी आदि बोलियां है उसी प्रकार मेवाडी मारवाडी, खेखावटी, ढूंढाडी, बागडी, माळवी, मेवाती आदि राजस्थानी की बोलियां है। जब लल्लूलाल की हिन्दी में इतनी बोलियां होते हुए यह नहीं पूछा जाता है तो ऐसा प्रश्न राजस्थानी के लिये क्यों पूछा जाता है कि कौन सी राजस्थानी।

भारत के कोने-कोने में और विश्व के कई देशों में राजस्थान से गये हुए लोग जिन्हें वहां मारवाडी कहा जाता है आज भी अपने घरों में राज्सथानी में ही अपना संवाद चलाते है। यदि किसी को देहना हो कि कौनसी राजस्थानी तो उनके घरों में जाकर देख ले। प्रसिद्ध अंग्रेज भाषाविद जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन इतालवी भाषाविद एल.पी.तेसीतरी एवं भारतीय भाषाविद डा.सुनीति कुमार चाटुर्ज्या डा. कालीचरण बहल अगर्चन्द नाहटा ने राजस्थानी को एक सवतन्त्र एवं सशक्त भाषा माना है तो हमें यह पूछने का पूर्ण अधिकार है कि जो कहते है कि कौन सी राजस्थानी? उनका भाषा ज्ञान कितना है।

भारत की संविधान सभा ने आठवी अनुसूची में विभिन्न भाषाओ को स्थान दिया तब जयनारायण व्यास एवं कालूलाल श्रीमाली (जो भारत के शिक्षा मंत्री रहे) ने राजस्थानी को अनुसूची में सम्मिलित करने हेतु प्रयास किया पर उनकी बात नहीं सुनी गई क्योंकि उन्होंने इसके लिए गांधीजी की तरह आमरण अनशन नहीं किया और न अन्य देशद्रोहियों की तरह अराजकता ही फैलाई।

राजस्थान का इससे बडा दुर्भाग्य क्या होगा कि जनता द्वारा चुने विधानसभा सदस्य को अपनी मातृभाषा राजस्थानी में शपथ लेने का अधिकार नहीं है। क्या सर्वोच्च न्यायालय मेरी आवाज सुनेगा।

पांच दशक पूर्व नागोर में नेहरूजी ने पंचायती ाज का उदघाटन किया था तब मेने नेहरूजी के दर्शन किए थे एवं उनकी स्वर्णजयंती पर जब श्रीमति सोनिया जी एवं श्री सी.पी.जोशी वहा आए तब भी मैं वहा था। पंचायत में महिलाओ, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछडा वर्ग को आरक्षण मिला हुआ है।  इन जनप्रतिनिधियों का अपनी मातृभाषा में बोलने लिखने का अधिकार नहीं है क्योंकि इनकी मातृभाषा राजस्थानी है और राजस्थानी को अभी तक (60 वर्ष हो जाने पर भी) मान्यता नहीं मिली है। फिर हमारा पंचायती राज सुदृढ कैसे होगा? डा.सी.पी.जोशी से यही प्रश्न है?

उम्मेदसिंह चुण्डावत "दुर्जन"
मान्यावास, राशमी, चित्तौडगढ
राजस्थान भारत
एल-2-बी, विश्वविधालय केम्पस
राजस्थान विश्वविधालय, जयपुर।
0141-2708909

96605 70638

Click here to view large image
Click here to view large image
Click here to view large image
Click here to view large image
Click here to view large image
Click here to view large image
Click here to view large image
Click here to view large image
Click here to view large image
Click here to view large image

 आपाणो राजस्थान
Download Hindi Fonts

राजस्थानी भाषा नें
मान्यता वास्ते प्रयास
राजस्तानी संघर्ष समिति
प्रेस नोट्स
स्वामी विवेकानद
अन्य
ओळख द्वैमासिक
कल्चर साप्ताहिक
कानिया मानिया कुर्र त्रैमासिक
गणपत
गवरजा मासिक
गुणज्ञान
चौकसी पाक्षिक
जलते दीप दैनिक
जागती जोत मासिक
जय श्री बालाजी
झुणझुणीयो
टाबर टोली पाक्षिक
तनिमा मासिक
तुमुल तुफानी साप्ताहिक
देस-दिसावर मासिक
नैणसी मासिक
नेगचार
प्रभात केसरी साप्ताहिक
बाल वाटिका मासिक
बिणजारो
माणक मासिक
मायड रो हेलो
युगपक्ष दैनिक
राजस्थली त्रैमासिक
राजस्थान उद्घोष
राजस्थानी गंगा त्रैमासिक
राजस्थानी चिराग
राष्ट्रोत्थान सार पाक्षिक लाडली भैंण
लूर
लोकमत दैनिक
वरदा
समाचार सफर पाक्षिक
सूरतगढ़ टाईम्स पाक्षिक
शेखावटी बोध
महिमा भीखण री

पर्यावरण
पानी रो उपयोग
भवन निर्माण कला
नया विज्ञान नई टेक्नोलोजी
विकास की सम्भावनाएं
इतिहास
राजनीति
विज्ञान
शिक्षा में योगदान
भारत रा युद्धा में राजस्थान रो योगदान
खानपान
प्रसिद्ध मिठाईयां
मौसम रे अनुसार खान -पान
विश्वविद्यालय
इंजिन्यिरिग कालेज
शिक्षा बोर्ड
प्राथमिक शिक्षा
राजस्थानी फिल्मा
हिन्दी फिल्मा में राजस्थान रो योगदान

सेटेलाइट ऊ लीदो थको
राजस्थान रो फोटो

राजस्थान रा सूरमा
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
आप भला तो जगभलो नीतरं भलो न कोय ।

आस रे थांबे आसमान टिक्योडो ।